सम्पूर्ण शिवताण्डवस्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित |
शिवताण्डवस्तोत्रम्: भगवान शिव की स्तुति में गाया गया एक परम प्रभावशाली और ओजस्वी स्तोत्र है। इसकी रचना लंकापति रावण ने की थी । 'स्तोत्ररत्नावली' के अनुसार, जो व्यक्ति पूजा के अंत में इस स्तोत्र का गान करता है, भगवान शंकर उसे स्थिर रथ, गज, अश्व आदि से युक्त सदैव सुमुखी रहने वाली सम्पत्ति (लक्ष्मी) प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र न केवल शिवजी के सौंदर्य का वर्णन करता है, बल्कि भक्त को परम शांति और पवित्रता भी प्रदान करता है। ॥ अथ श्रीशिवताण्डवस्तोत्रम् ॥ जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥ हिंदी अर्थ: जिन्होंने जटारूपी अटवी (वन) से निकलती हुई गङ्गाजी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गये गले में साँपों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर, डमरू के डम-डम शब्दों से मण्डित प्रचण्ड ताण्डव (नृत्य) किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें। जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२...